Dharmendra ka blog धर्मेन्‍द्र का ब्‍लाग

मेरी कविताएं जो जिनकी शुरुआत अचानक ही वैचारिक प्रस्‍फुटन के साथ हो गई। हर मनोदशा में बिना कुछ छुपाए शब्‍दों में सब उजागर कर दिया है यहॉं। हालॉंकि कुछ कविताओं कि रचना नौसीखिए कि तरह जानबूझ कर भूमिका बनाए बिना ही की है पर लिखते समय यही अच्‍छा लगा इसलिए लिख डाली और कहडाली दिमागी उधेड़बून।

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Name: धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी
Location: Pichhore ( Shivpuri ), Madhya Pradesh, India

सामन्‍य सा दिखने वाला हमेशा मुस्‍कुरानेवाला, फिल्‍मों की बातें करने वाला और हमेशा नए विचार के पीछे भागने वाला।

Wednesday, October 28, 2009

कुछ नहीं कहना चाहता

कुछ नहीं कहना चाहता, खामोशी से सब कुछ समझ लेना, इस दिल में क्‍या है,
आंखों से ही चख लेना,
आत्‍मा आज तरस रही है, अरमानों की घटा बरस रही है, मुझे तुम मिल जाओ, मेरी सांसों में घुल जाओ,
हां मैंने किया है, तुम भी करती हो, इकरार न करने का दिखावा करती हो,
अचानक ही तुम्‍हें कुछ हो जाएगा,
तुम्‍हारी मनाही का सच प्‍यार में बदल जाएगा,
तुम्‍हारी भी हालत मेरी सी होगी, तब जाकर मेरी ख्‍वाहिश पूरी होगी।

बढ़ना है।

मुझे तो बढ़ना है, शिखर पर चढ़ना है,

रास्‍ते की चिंता नहीं है, पैरों से जब चलना है,

पैर न भी हो तो मन से चलूंगा,

कितना भी ऊंचा हो शिखर, नत मस्‍तक उसे करुंगा,

अब सोचना क्‍या है सिर्फ बढ़ना है,

थक जाएं अगर पैर तो हौसले से आगे बढ़ना है।

बढ़ना है, चढ़ना है, चलते रहना है।

Thursday, March 26, 2009

कविता आपकी ....

सबकी कहानी कहती है कविता .....
बोलकर भी चुप रहती है कविता ....
कविता आपकी ....

आपके और दुनिया के बीच रहती है कविता ...
आपके दिल से दुनिया का हाल कहती है कविता ....
सुन्दर है बहुत ये ....

दिल की सुन्दरता है, दिल का दर्पण है कविता....
लफ्जों में दिलकी जबान सुकूनो आराम है कविता ....
कविता आपकी ....

Saturday, March 21, 2009

मोती

चुन-चुन प्यार के मोतियों से माला पिरोई थी .....
विश्वास के धागे से आस संजोई थी ..........
पर धागा टूट गया .........
एक एक मोती बिखर गया ......

मोती ऐसे बिखरे ...
के बटोरे नहीं जाते .....

हाथ मैं रह गया विश्वासघाती धागा है .....
ये मेरे पास है क्यों ...?
मोती जो मेरे अपने थे बिखर गए हैं.....
मुझसे हैं दूर क्यों ....?

ये विडम्बना है या संसार की रीत .....
वे मेरे मोती जिनसे थी प्रीत ....
मेरे पास नहीं हैं ....
जिस पर था विश्वास उससे कोई आस नहीं है .....

आखिर क्यों ...?

बचपने और शैतानी के रंग

अब वो फुर्सत नहीं रही .....
बच्चे भी नहीं रह गए हम......
पर रंग और उमंग आज भी है जिन्दा .....
सोचता हूँ वही बच्चा बनकर खेलूं होली ......
बचपने और शैतानी के रंग से ......

Thursday, March 19, 2009

खुद की पहचान

करना है कुछ बड़ा .....
अब नहीं रहना खड़ा....
इस भीड़ मैं .....

इच्छाओं का निचोड़ क्या है ....
ऐसे ही पड़े रहने का औचित्य क्या है ......

दिखाई दे रहा है सब ....
बस कदम बढ़ाने की देर है ....

जिसका दम भरता है ....
उसी पर मरना भी होगा .....

गर नदी है तो किनारे भी होंगे ....
झोली मैं आसमान के तारे होंगे .....

उलझने दिमाग से निकाल दे .....
आगे बढ़ना है....
नए कीर्तिमान गढ़ना है ....
बात ये जहन मैं उतार दे ....

खुद से खुद की पहचान ले ...
तूं है कौन पहले ये जान ले ....
तब जहान और आलम तुझे मानेगा ....
विचारों की तेरे क़द्र वो जानेगा.....

इकरार

उफ तेरा ख़याल.........

नशा ही नशा...नशा ही नशा.......

एक निगाह तेरी ...

तड़प ही तड़प .... तड़प ही तड़प .....

हाय वो अदा .....

सदा ही सदा ... सदा ही सदा ....

मुस्कान और एक इनायत तेरी ......

फूल ही फूल ... फूलों की बहार .....

मुंह फेरे, चलते-चलते रुकजाना .....

इन्तजार...इन्तजार और शायद इकरार .....

रूमानियत

एक अद्भुत सा एहसास है ........

हर पल लगता खास है .........

इसी रूमानियत मैं जीने को दिल करता है ........

इसकी राह है लम्बी .........

बस कयासों मैं ही गुजर है करनी ........

पर क्या करें कुछ हो गया है .....

अब उसी की माला है जपनी ........

Saturday, March 14, 2009

चंद लम्हे

मुझे है होश इतना कि बस तुम्हें याद रखता हूँ ............
बरना हमें तो खुद की कोई खबर नहीं रहती ...............

कुछ ख़ास लम्हों मैं तुम्हें ढूँढता हूँ मैं ................
के चंद लम्हे पत्तियों पर ओस है रहती ..............
सुबह जैसी भी हो आखिर सुबह है ............
कि सूरज उगता है तब .......
कि याद कैसी भी हो याद है .........
आखिर यादों मैं है तूं रहती ...........

अगर रोता तो दिल से उतर जाती तूं ...........
इसलिए आँखों मैं अब नमी नहीं रहती ..............

मायूसियां बेताब हैं जब्द मैं लेने को अपनी ..........
कि मायूस होने को तेरी यादों से फुर्सत नहीं होती...........


धर्मेन्द्र त्रिपाठी................

Sunday, March 8, 2009

एक डगर अनोखी सी

न उलझ-उलझ न मोह मैं पड़...........
चल निकल-निकल चल निकल-निकल........
ये जाल है ये धोका है, इसी ने अबतक रोका है ..............
अडजा अडजा.............जा बढ्जा-बढ्जा..............
ये फांस रहा ....... वो तांक रहा ..........
ये पाश मैं ........ वो बाट मैं ............
मगन न हो ...........अगन रहे ......
पिंजरे मैं भी ..........तड़पन रहे
दायरे से ......... बाहर आ ..........
इरादों के भी ..........पार जा .........
मार दे डरको ........ गाड़ दे सबको ..........
आकाश देख ......... अमित रेखा ईंच..........
सांस भर ......... मुट्ठियाँ भींच ............
एक डगर बना अनोखी सी ...........आकाश गढ़ कुछ अपना सा...........

Friday, March 6, 2009

खुशबु

कभी खुशबु सी आती है ....

तो महक उठतीं हैं यादें ....

छाजाती है सुनहरी सी .....
वो एक अक्स उभरता है ....

ये दिल मशरूफ रहता है उस लम्हे मैं ....
अभी है वो पास ....

जैसे कह रहा है कुछ ख़ास .....

जो कभी कहा था उसने ....
बस एक एहसास ही है बाकी .....

जो हर रोज रहता है ....
है चेहरे पर मेरे ख़ुशी ....

वही जो तब तुम्हारे चेहरे पर भी थी .....
है हर वो पल भी इस लम्हे ....

जो तब जिया था तुम्हारे साथ ....

क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद .....

मेरा मौसम

मेरा मौसम आगया है .....
अब उस जकड़न से निजाद मिल गई .....
हो गया हूँ आजाद फिरूं कैसे भी ....
रात की गुनगुनी ठंडी सी राहत भरी हवा ......
सुबह की खुशनुमा रौशनी....
मन को सकून देने वाला आलम .....
लम्बी रातों की बात गई सी हो गई ....
अब दिन बड़े होंगे...
यहाँ शाम होगी देर तक तो सुबह जल्दी हो गई ....
हाँ मगर दोपहर मैं तपिश होगी बहुत आएगा पसीना ....
पर जब मिल जाएगी छाँव और कोई हवा का झोंका .....
ठंडक और सकून आ जाएगा .....

Monday, February 9, 2009

दोस्तों के साथ दिन कट रहें हैं ........... अभी हाल ही मैं कुछ झगड़ा और मन मुटाव से निजाद पाया हैं .....
अब तो साथ ही काम पर निकेलते हैं .......... यहाँ तक कि अब सोने और जागने मैं भी समझ बैठा ली हैं .......... अब थोड़ा समय उस कमरे को भी देने लगें है ............. जिसमें केबल सोने और धोने जाते थे ........... हाँ अब लगता हैं ..... कि हमारे शीत यूध मैं मोंन रहने वाला वह कमरा हमें कितना याद करता होगा ............सच अब अच्छा लगता है जब मिल बैठते हैं मैं, अश्वनी और राज दादा .............