मेरी कविताएं जिनकी शुरुआत अचानक ही वैचारिक प्रस्फुटन के साथ हो गई। हर मनोदशा में बिना कुछ छुपाए शब्दों में सब उजागर कर दिया है यहॉं। हालॉंकि कुछ कविताओं कि रचना नौसीखिए कि तरह जानबूझ कर भूमिका बनाए बिना ही की है पर लिखते समय यही अच्छा लगा इसलिए लिख डाली और कहडाली दिमागी उधेड़बून।
ज़िंदगी क्या है ? ये बताएं कैसे ? तेरे माफ़िक नज़र आएं कैसे ? तूने ढंक रखा है, अपनी आंखों को, सोच तुझे नजर आएं कैसे ? चाहत तुझ में भी है, और मुझ में भी, है इश्क़ की आग दोनों जानिब, तूं माहिर है इसमें, पर हम छुपाएं कैसे?
बच्चों की नानी ने, बचपन की कहानी ने, ज़िंदगी की रवानी ने, दोस्तों के क़िस्सों ने, झूठे और सच्चों ने, किताबों के पन्नों ने, स्कूल के बस्तों ने, बड़े होने की ख़्वाहिशों ने, संघर्ष और आजमाइशों ने, प्यार भरी रातों ने, कसमों और वादों ने, मेरी एक पूरी तस्वीर बनाई है, आज एक पीढ़ी पूरी ज़हन ने दोहराई है। एक शख़्सियत पूरी हो गई, एक कहानी शुरू हो गई।
शब्दों में लिपटी जहन की बात काश जहन समझ ले शब्दों की ग़लतियां तो कभी भी सुधर जाती है्ं तर्क जहन के देते.. शब्दों भरे नहीं.. आखिर थी तो ये दिल की बात