मेरी कविताएं जिनकी शुरुआत अचानक ही वैचारिक प्रस्फुटन के साथ हो गई। हर मनोदशा में बिना कुछ छुपाए शब्दों में सब उजागर कर दिया है यहॉं। हालॉंकि कुछ कविताओं कि रचना नौसीखिए कि तरह जानबूझ कर भूमिका बनाए बिना ही की है पर लिखते समय यही अच्छा लगा इसलिए लिख डाली और कहडाली दिमागी उधेड़बून।
Sunday, June 26, 2011
मंजिल
मंजिल पूँछती रहती है, कब तूँ हासिल-ए-नसीब होगा, सही सवाल उसके जहन में दिनों रात रहता है।
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