मेरी कविताएं जिनकी शुरुआत अचानक ही वैचारिक प्रस्फुटन के साथ हो गई। हर मनोदशा में बिना कुछ छुपाए शब्दों में सब उजागर कर दिया है यहॉं। हालॉंकि कुछ कविताओं कि रचना नौसीखिए कि तरह जानबूझ कर भूमिका बनाए बिना ही की है पर लिखते समय यही अच्छा लगा इसलिए लिख डाली और कहडाली दिमागी उधेड़बून।
Thursday, May 27, 2010
चाहत...
जिंदगी क्या है... ये बताएं कैसे... तेरे माफिक नज़र आऍं कैसे... तूने ढक रखा है,अपनी ऑंखों को... सोच तुझे नजर आएँ कैसे... चाहत तुझ मैं भी है मुझ मैं भी... है दोनों जानिब... तूँ माहिर है इसमें पर हम छुपाऍं कैसे...
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