Thursday, April 1, 2010

काश के...

काश के हम रोज मिलें

काश के हम रोज बिछुडें

काश के में रोज बेकरार हो जाउँ

काश के तुम रोज चैन बन जाओ

काश के तुम रोज बुत बन जाओ

काश के में रोज उलझला रहूँ

काश के रोज तुम अनजाने में कुछ कर दो

काश के में रोज उसके कुछ मायने निकालूं

काश के रोज तुम निशब्‍द रहो

काश के में रोज सुनने को बेकरार रहूंू

काश के तुम रोज ही न आओ

काश के में तुम्‍हारी राह देखूं

काश के तुम इस सब से अनजान रहो

काश के में तुम्‍हें ये सब बताऊं

1 comments:

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com