Sunday, February 14, 2010

वही हकीकत, वही अफसाना...

तुम पढ़ते मन हमारा,
हम तुम्हारा मन पढ़ लेते,
यूँ न रहते चुपचाप चुपचाप,
काश एक दफा हम मिल लेते,

हॉं दूरियॉं हैं फासले हैं
और न कभी दिल मिले हैं
फिर ये क्याल हुआ है
जाने किसने मन छुआ है
बैचेनी, इंतजार,
और यही सिलसिला बार-बार

कभी प्यार
कभी तकरार

पर किससे प्यार
पर किससे तकरार

बिना बातों का सिलसिला
सिलसिेले के बिना बातें

रोज झलक भरा दिन
रोज ख्वाब भरी रातें

कभी अंजाम
कभी आगाज

इंतहा कुछ कुछ
कुछ कुछ बीराना

रात से दिन
दिन से रात

वही हकीकत
वही अफसाना...

1 comments:

संजय भास्कर said...

-बिल्कुल सही कहा!! उम्दा रचना!