मेरी कविताएं जिनकी शुरुआत अचानक ही वैचारिक प्रस्फुटन के साथ हो गई। हर मनोदशा में बिना कुछ छुपाए शब्दों में सब उजागर कर दिया है यहॉं। हालॉंकि कुछ कविताओं कि रचना नौसीखिए कि तरह जानबूझ कर भूमिका बनाए बिना ही की है पर लिखते समय यही अच्छा लगा इसलिए लिख डाली और कहडाली दिमागी उधेड़बून।
Wednesday, January 13, 2010
हम कैसे हैं ............???
हम अच्छे हैं, बुरे हैं, सच्चे हैं, झूठे हैं, दोस्त हैं, दुश्मन हैं, मज़े में हैं, फँसे में हैं, गुलाम हैं, आजाद हैं, मूक हैं बाचाल हैं अकारथ हैं सकारथ हैं, बुद्धु हैं होशियार हैं स्वस्थ्ा हैं, बीमार हैं, उदास हैं, प्रसन्न हैं, रीझे हैं, खिन्न हैं, धनी हैं, फक्कड़ हैं, रुके हैं, धुमक्कड़ हैं, चुलबुले हैं, धीर हैं, चंचल हैं, गंभीर हैं, निरंग हैं, सतरंगे हैं, शोर हैं, शान्ति हैं, तर्क हैं, भ्रांति हैं, व्यंग हैं, कविता हैं, गीत हैं, गजल हैं, राज हैं, उजागर हैं, मीत हैं, प्रथक हैं, आलस हैं, सजग हैं, रीत हैं, विपरीत हैं, शीत हैं, ग्रीष्म हैं, भूखे हैं, अफरे हैं, सिमटे हैं, विखरे हैं........मेरा जीवन इन सभी विरोधाभास और पूरकों की मिलावट हैं इस मिलावट से बना मिलाजुला सा एक व्यक्ति है और वह "मैं " हूँ .......... ( यहॉं "मैं " के मायने हर उस व्यक्ति से हैं जो इसे पढ़ रहा है। )
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment